जानिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 को सरल भाषा में। ‘राज्य’ की परिभाषा, इसका दायरा और मौलिक अधिकारों से इसका संबंध आसान उदाहरणों के साथ समझें।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 (Article 12 in Hindi) – परिभाषा
अनुच्छेद 12 हमें यह समझाता है कि संविधान के भाग 3 में जहाँ कहीं भी ‘राज्य’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है, उसका मतलब क्या है। यह समझना बहुत जरूरी है क्योंकि संविधान में मौलिक अधिकार (जैसे बोलने की आजादी, समानता का अधिकार इत्यादि) मुख्य रूप से ‘राज्य’ द्वारा किए गए किसी भी अन्याय से हमारी रक्षा करते हैं। इसलिए, यह जानना जरूरी है कि आखिर ‘राज्य’ के दायरे में कौन-कौन आता है।
मुख्य बिंदु:
अनुच्छेद 12 के अनुसार, ‘राज्य’ सिर्फ सरकार का नाम नहीं है, बल्कि इसमें निम्नलिखित सभी संस्थाएं और प्राधिकरण शामिल हैं। अगर इनमें से कोई भी हमारे मौलिक अधिकारों का हनन करता है, तो हम कानूनन उसके खिलाफ जा सकते हैं।
‘राज्य’ के दायरे में ये सब आते हैं:
- भारत सरकार और संसद: इसका मतलब केंद्र सरकार (जो पूरे देश के लिए काम करती है) और संसद (जो केंद्र स्तर पर कानून बनाती है) से है।
- राज्य सरकारें और विधानमंडल: इसमें हर राज्य की अपनी सरकार (जैसे उत्तर प्रदेश सरकार, बिहार सरकार) और राज्य की विधानसभा (जो राज्य स्तर पर कानून बनाती है) शामिल हैं।
- स्थानीय प्राधिकरण: ये वो संस्थाएं हैं जो शहर या गांव स्तर पर काम करती हैं। उदहारण – नगर निगम, नगर पालिका, जिला परिषद, ग्राम पंचायत।
- अन्य प्राधिकरण: यह सबसे व्यापक श्रेणी है। इसमें वे सारी संस्थाएं शामिल हैं जो भारत के अंदर काम करती हैं या जिन पर भारत सरकार का नियंत्रण है। ये सरकारी विभाग हो सकते हैं या फिर ऐसी कंपनियाँ और संस्थान जिनमें सरकार की हिस्सेदारी या नियंत्रण हो। उदहारण – भारतीय रेलवे, भारतीय स्टेट बैंक (SBI), विश्वविद्यालय, कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी संस्थाएं।
महत्वपूर्ण शर्त: यह परिभाषा तब लागू होती है, जब तक कि किसी विशेष संदर्भ में इसका अलग अर्थ न निकलता हो।
अनुच्छेद 12 के अंतर्गत “अन्य प्राधिकरण” (Other Authorities) का अर्थ प्रमुख न्यायिक निर्णयों के आधार पर समझा जा सकता है।
Rajasthan State Electricity Board v. Mohanlal में यह निर्णय दिया गया कि “अन्य प्राधिकरण” शब्द इतना व्यापक है कि इसमें प्रत्येक वह प्राधिकरण शामिल है जो किसी विधि (statute) के द्वारा स्थापित किया गया हो और जिसे सरकारी या अर्ध-सरकारी कार्यों के निष्पादन हेतु शक्तियाँ प्रदान की गई हों, तथा जो भारत के क्षेत्र में कार्य कर रहा हो या भारत सरकार के नियंत्रण में हो।
इसके पश्चात् न्यायालय ने अनुच्छेद 12 के अंतर्गत किसी संस्था को ‘अन्य प्राधिकरण’ मानने के लिए कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किए। Ramana Dayaram Shetty v. International Airport Authority of India के मामले में न्यायालय ने कहा कि निम्न परिस्थितियों में किसी संस्था को ‘राज्य’ माना जा सकता है—
- यदि उसके समस्त या अधिकांश अंश (shares) सरकार के स्वामित्व में हों।
- यदि उसका लगभग पूरा व्यय सरकार द्वारा वहन किया जाता हो।
- यदि उसे राज्य द्वारा एकाधिकार (monopoly) प्रदान किया गया हो।
- यदि उस पर सरकार का गहन और व्यापक नियंत्रण हो।
- यदि उसके कार्य सार्वजनिक महत्व (public importance) के हों।
- यदि सरकार का कोई विभाग निगम (corporation) में परिवर्तित कर दिया गया हो।
भारतीय न्यायालयों ने समय-समय पर ‘राज्य’ शब्द की व्याख्या विभिन्न संदर्भों में की है, ताकि मौलिक अधिकारों के दायरे का विस्तार किया जा सके।
University of Madras v. Santa Bai में मद्रास उच्च न्यायालय ने “ejusdem generis” अर्थात् “समान प्रकृति” का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसका अर्थ है कि ‘अन्य प्राधिकरण’ में वे ही संस्थाएँ सम्मिलित होंगी जो सरकारी या संप्रभु (sovereign) कार्य करती हों।
Sukhdev v. Bhagatram के मामले में एल.आई.सी. (LIC), ओ.एन.जी.सी. (ONGC) तथा आई.एफ.सी. (IFC) को ‘राज्य’ माना गया, क्योंकि वे ऐसे कार्य कर रही थीं जो सरकारी या संप्रभु प्रकृति के थे।
न्यायपालिका के ‘राज्य’ होने के प्रश्न पर भी व्यापक चर्चा हुई है। प्रख्यात विधिवेत्ता एच.एम. सीरवै (H.M. Seervai) और वी.एन. शुक्ला (V.N. Shukla) ने न्यायपालिका को ‘राज्य’ माना है। उनके मत को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 145 और 146 का समर्थन प्राप्त है।
यह माना गया कि सर्वोच्च न्यायालय को न्यायालयों की कार्यप्रणाली एवं प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बनाने तथा अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति एवं उनकी सेवा-शर्तें निर्धारित करने का अधिकार है।
Prem Garg v. Excise Commissioner, H.P. में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब न्यायपालिका अपनी नियम-निर्माण शक्ति (rule-making power) का प्रयोग करती है, तब वह ‘राज्य’ के अंतर्गत आती है।
हालाँकि, इस विषय पर भिन्न मत भी व्यक्त किए गए हैं। Rati Lal v. State of Bombay में यह कहा गया कि अनुच्छेद 12 के प्रयोजन के लिए न्यायपालिका ‘राज्य’ नहीं है। इसी प्रकार A.R. Antulay v. R.S. Nayak तथा N.S. Mirajkar v. State of Maharashtra में यह अवलोकन किया गया कि “जब न्यायपालिका की नियम-निर्माण शक्ति की बात होती है, तब वह ‘राज्य’ है; किन्तु जब वह न्यायिक शक्ति का प्रयोग करती है, तब वह ‘राज्य’ नहीं मानी जाती।”
इस प्रकार, अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ शब्द की अवधारणा भारत में विभिन्न उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है। इसे व्यापक अर्थ प्रदान किया गया है, जिससे संविधान के भाग-III (मौलिक अधिकारों) को अधिक विस्तृत रूप में लागू किया जा सके।
संक्षिप्त सारांश: संविधान का अनुच्छेद 12 ‘राज्य’ शब्द को एक विस्तृत परिभाषा देता है। ‘राज्य’ सिर्फ केंद्र और राज्य सरकारें ही नहीं हैं, बल्कि इसमें संसद, विधानसभाएं, स्थानीय निकाय (जैसे पंचायत और नगर निगम) और वे सभी सार्वजनिक संस्थान या प्राधिकरण शामिल हैं जिन पर सरकार का नियंत्रण है। इस परिभाषा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सत्ता के किसी भी रूप के खिलाफ नागरिकों को न्याय मिल सके और उनके मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें।
अनुच्छेद 12 से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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क्या कोई प्राइवेट कंपनी भी ‘राज्य’ के दायरे में आ सकती है?
आमतौर पर कोई प्राइवेट कंपनी ‘राज्य’ नहीं मानी जाती। लेकिन अगर सरकार का उस कंपनी पर गहरा नियंत्रण हो, या सरकार के पास उसके कामकाज में दखल देने की शक्ति हो, तो अदालत उसे ‘राज्य’ मान सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो अगर कोई संस्था सरकार के भारी नियंत्रण में काम कर रही है, तो वह ‘अन्य प्राधिकारी’ होने के कारण राज्य की परिभाषा में आ सकती है।
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क्या इस परिभाषा के अनुसार ‘अदालतें’ भी राज्य हैं?
हाँ, न्यायपालिका (अदालतें) भी ‘राज्य’ के दायरे में आती हैं। अदालतें सरकार के नियंत्रण में काम करती हैं और उनके फैसले कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। इसलिए अगर किसी अदालत का आदेश या प्रक्रिया किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन करती है, तो उसे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
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क्या कोई निजी स्कूल या कॉलेज राज्य है?
यह निजी स्कूल की प्रकृति पर निर्भर करता है। अगर स्कूल सरकार से पूरी तरह से मान्यता प्राप्त (affiliated) है और सरकार के नियमों का पालन करता है, तो कुछ मामलों में उसे ‘राज्य’ माना जा सकता है। लेकिन पूरी तरह से निजी और बिना किसी सरकारी मदद वाला स्कूल आमतौर पर राज्य नहीं माना जाता।
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क्या सरकारी बैंक (जैसे SBI) राज्य के दायरे में आते हैं?
हाँ। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) या अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (जिनमें सरकार की हिस्सेदारी होती है) ‘अन्य प्राधिकारी’ होने के कारण राज्य की परिभाषा में आते हैं। इसलिए अगर कोई सरकारी बैंक किसी ग्राहक के साथ भेदभाव करता है या उसके मौलिक अधिकारों का हनन करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
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क्या ग्राम पंचायत राज्य है?
बिल्कुल हाँ। ग्राम पंचायत एक ‘स्थानीय प्राधिकारी’ है, जिसका सीधा जिक्र अनुच्छेद 12 में किया गया है। इसलिए पंचायत पर भी मौलिक अधिकार लागू होते हैं।
संदर्भ स्रोत:
- भारत के संविधान में अनुच्छेद 12, इंडियन कानून [https://indiankanoon.org/doc/609139/]
- अनुच्छेद 12 की परिभाषाएँ, ConstitutionofIndia.net [https://www.constitutionofindia.net/articles/article-12-definitions/]
- मौलिक अधिकार [https://knowindia.india.gov.in/profile/fundamental-rights.php]
